
रायगढ़, 29 जुलाई। रायगढ़ जिले के खरसिया तहसील में स्थित दर्रामुड़ा के रहने वाले शैलेंद्र पटेल की जिंदगी बीते तीन महीनों से बेहद मुश्किल दौर से गुजर रही है। एक मध्यमवर्गीय परिवार से ताल्लुक रखने वाले शैलेंद्र बिंजकोट-दर्रामुड़ा स्थित सारडा एनर्जी एंड मिनरल्स लिमिटेड में नौकरी करके किसी तरह अपने परिवार का गुजर-बसर करते हैं। हर दिन की तरह वे 29 अप्रैल को भी अपनी इलेक्ट्रिक स्कूटी से बी-शिफ्ट की ड्यूटी पर आए थे। उन्होंने गाड़ी को कंपनी के सुरक्षित पार्किंग इलाके में खड़ा किया और अपने काम में जुट गए। लेकिन उन्हें क्या पता था कि कुछ ही घंटों में उनकी जमा-पूंजी और सहूलियत का एकमात्र साधन एक हादसे का शिकार होकर कबाड़ में बदल जाएगा।
लापरवाही की इंतहा और बेकाबू ट्रैक्टर का तांडव
शाम के वक्त जब शैलेंद्र अपने कार्यस्थल पर मौजूद थे, तभी अचानक पार्किंग से कुछ अनहोनी होने की खबर आई। भागते हुए जब वे मौके पर पहुंचे, तो वहां का नजारा देखकर उनके पैरों तले जमीन खिसक गई। भारी-भरकम गाड़ियों की टक्कर से वहां अफरा-तफरी मची हुई थी। पूछताछ करने पर पता चला कि कोयला लेकर पहुंचे एक बेलगाम ट्रेलर (क्रमांक CG12BG9223) ने पार्किंग में खड़ी एक ट्रैक्टर को जोर से टक्कर मार दी थी। इस जोरदार भिड़ंत से ट्रैक्टर अचानक चालू हो गया और अनियंत्रित होकर आगे बढ़ने लगा। बेकाबू ट्रैक्टर ने पार्किंग में खड़ी कई दोपहिया गाड़ियों को रौंद डाला। इस हादसे में सबसे ज्यादा नुकसान शैलेंद्र की इलेक्ट्रिक स्कूटी का हुआ, जो ट्रैक्टर के नीचे बुरी तरह फंसकर चकनाचूर हो चुकी थी। अपनी आंखों के सामने अपनी मेहनत की कमाई से खरीदी स्कूटी को लोहे के मलबे में तब्दील देखकर शैलेंद्र पूरी तरह टूट गए।
ट्रांसपोर्टर का धोखा : बड़े-बड़े वादे और झूठे आश्वासन
घटना के बाद कंपनी परिसर में हड़कंप मच गया। मामले को दबाने और अपनी सीधी जिम्मेदारी से बचने के लिए ट्रांसपोर्टर और कंपनी प्रबंधन ने तुरंत लीपापोती शुरू कर दी। दो मई को पीड़ित शैलेंद्र, कंपनी के अधिकारियों और ट्रांसपोर्टर के बीच एक सहमति बनी। ट्रांसपोर्टर ने बड़े-बड़े दावे करते हुए गाड़ी बनवाने का जिम्मा लिया और कहा कि अगर स्कूटी ठीक नहीं हो पाई, तो वे नई स्कूटी खरीदकर देंगे। शैलेंद्र को लगा कि शायद उनका नुकसान पूरा हो जाएगा, लेकिन यह सिर्फ एक दिलासा साबित हुआ। गाड़ी ले जाने के बाद ट्रांसपोर्टर का रवैया पूरी तरह बदल गया। तीन महीने का लंबा वक्त बीत चुका है, लेकिन न तो स्कूटी ठीक होकर वापस आई और न ही कोई मुआवजा मिला। ट्रांसपोर्टर की इस घोर गैर-जिम्मेदारी और असंवेदनशीलता ने शैलेंद्र को दर-दर भटकने पर मजबूर कर दिया है।
पैदल और लिफ्ट के सहारे कट रही जिंदगी, दर्द से कराहता पीड़ित
आज स्थिति यह है कि एक अदद सवारी के लिए तरस रहे शैलेंद्र को रोज ड्यूटी आने-जाने के लिए भारी मानसिक और शारीरिक यातना झेलनी पड़ रही है। कभी वे किसी राहगीर से लिफ्ट मांगते हैं, तो कभी तपती धूप और बारिश में पैदल ही कई किलोमीटर का सफर तय करते हैं। तीन महीने से लगातार मिल रही उपेक्षा और ट्रांसपोर्टर की हठधर्मिता ने उन्हें मानसिक रूप से तोड़कर रख दिया है। एक मध्यमवर्गीय कर्मचारी के लिए गाड़ी सिर्फ एक साधन नहीं, बल्कि उसकी रोजमर्रा की जिंदगी की धुरी होती है। पीड़ित शैलेंद्र ने बेहद भावुक मन से एक बार फिर कंपनी प्रबंधन और आरोपी ट्रांसपोर्टर से गुहार लगाई है कि उनकी मजबूरी को समझा जाए। वे अब भी आस लगाए बैठे हैं कि कोई बीच का रास्ता निकालकर उन्हें नई गाड़ी दी जाए या उचित मुआवजा मिले, ताकि उनकी जिंदगी फिर से पटरी पर लौट सके।

