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उद्योग विभाग के संरक्षण में कंपनियां बचा रही करोड़ों रुपए

  • सीएसआर के तहत जिले में 29 उद्योग लेकिन तीन ने ही दी राशि, कई बार निर्देशों के बावजूद किए गए कार्यों की भी नहीं दे रहे जानकारी

रायगढ़। कॉर्पोरेट सामाजिक उत्तरदायित्व का अर्थ होता है, जहां से उद्योग कमाई कर रहे हैं, वहां के समाज के लिए अपने मुनाफे से कुछ हिस्सा देना। सीएसआर के तहत मुनाफे का दो प्रश लिया जाता है जिसे उसी उद्योग के प्रभावित क्षेत्र में खर्च करना होता है। दिलचस्प बात यह है कि उद्योग विभाग के संरक्षण में कंपनियां अपने करोड़ों रुपए बचा रही हैं। विभाग उनसे न तो पूछता है और न ही कार्रवाई करता है। बड़ी-बड़ी कंपनियां रायगढ़ आईं और विशाल प्लांट स्थापित किए। कई कंपनियों ने यहां की धरती का सीना चीरकर बेशकीमती कोयले से अरबों रुपए का साम्राज्य खड़ा कर लिया। यहां के संसाधनों का दोहन कर कंपनियों ने अपनी बैलेंस शीट में कई जीरो जोड़ लिए। लेकिन इसके बदले कंपनियों को रायगढ़ के लिए जो करना था, वो नहीं किया। कई सालों से सीएसआर का प्रावधान औद्योगिक नीति में शामिल है। इसके तहत उद्योगों को अपने सालाना मुनाफे का दो प्रश सीएसआर के तहत खर्च करना है। उद्योग से प्रभावित क्षेत्र में लोगों के लिए यह रकम खर्च की जानी है।

रायगढ़ जिले में इस नियम को थोड़ा बदलकर राशि जमा करने का काम शुरू किया गया। हैरत की बात यह है कि जितने उद्योगों को दो प्रश राशि देनी थी, उन्होंने नहीं दी। रायगढ़ जिले में कुल 29 उद्योग ऐसे हैं जो दो प्रश वाले कैटेगरी में आते हैं। जब सीएसआर की जानकारी देखी गई तो पता चला कि इनमें से सभी उद्योग अपना दायित्व सही तरीके से नहीं निभा रहे हैं। वर्ष 23-24 में 3, 24-25 में 11 और 25-26 में 3 उद्योगों ने ही राशि जमा की। इसमें एनटीपीसी और एसईसीएल कॉमन हैं। इनके अलावा दूसरी कंपनियों ने इस ओर ध्यान ही नहीं दिया। सीएसआर की राशि देने से बचने के लिए उद्योग विभाग को अपने साथ शामिल कर लिया। इसी का नतीजा है कि उद्योगों पर कोई भी कार्रवाई नहीं की गई। अब इस मुद्दे पर नजर डाली जा रही है क्योंकि रायगढ़ जिले में ढेरों काम कराए जाने हैं। मजे की बात यह है कि कभी भी उद्योगों के बैलेंस शीट या मुनाफे की सही जानकारी भी प्रस्तुत करने को नहीं कहा गया।

रेवड़ी की तरह सब्सिडी बांटने में व्यस्त अफसर
उद्योग विभाग ने रायगढ़ के लोगों का हक भी छीना है। जिस राशि से असंख्य काम हो सकते थे, वह जमा ही नहीं करवाई। उल्टा सरकार की राशि सब्सिडी के रूप में उड़ाई। बीते पांच सालों में ऐसे कई छोटे उद्योगों को सब्सिडी बांटी गई है जिनकी लागत ही उतनी नहीं है। गलत तरीके से लागत बढ़ाने के मामलों पर रोक नहीं लगाई गई। राइस मिल, फ्लाई एश ब्रिक्स प्लांट, क्रशर आदि को मनमानी राशि सब्सिडी के रूप में बांटी गई। सीएसआर के तहत रकम जमा नहीं कराने पाने वाला जिला उद्योग एवं व्यापार केंद्र सब्सिडी बांटने में अव्वल रहा।

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