Sarangarh

सखी वन स्टॉप सेंटर ने दहेज प्रताड़ना पीड़िता को दिलाया न्याय, वापस कराया विवाह का सामान

सारंगढ़–बिलाईगढ़। दहेज प्रताड़ना की शिकार एक विवाहिता को सखी वन स्टॉप सेंटर और पुलिस विभाग की संयुक्त पहल से राहत मिली है। पति द्वारा लगातार प्रताड़ित किए जाने के बाद महिला ने अलग रहने और विवाह में मिला सामान वापस लेने की इच्छा जताई थी। केंद्र की समझाइश और काउंसलिंग के बाद पति सामान लौटाने पर सहमत हो गया, जिसके बाद टीम ने दोनों पक्षों की मौजूदगी में सामान वापस दिलवाया।

प्राप्त जानकारी के अनुसार, जिले की पीड़िता का विवाह होने के महज एक माह बाद ही पति ने दहेज में स्कूटी नहीं मिलने का ताना देकर प्रताड़ना शुरू कर दी थी। बेटी का घर बचाने के लिए मायके पक्ष के लोग स्कूटी की मासिक किस्त चुकाने को भी तैयार हो गए थे। इसके बावजूद पति का रुख नहीं बदला। महिला ने आरोप लगाया कि पति उसके माता-पिता से प्रतिमाह 20 हजार रुपये की मांग करने लगा और उसे मायके जाने से रोकते हुए शारीरिक व मानसिक रूप से परेशान करने लगा।

काउंसलिंग और प्रशासनिक समन्वय से निकला समाधान

लगातार हो रही प्रताड़ना और बातचीत का कोई परिणाम न निकलने पर पीड़िता ने पति से अलग होने का निर्णय लिया और अपने स्त्रीधन व विवाह के सामान की वापसी की मांग उठाई। मामले की गंभीरता को देखते हुए प्रकरण महिला संरक्षण अधिकारी को भेजा गया, जिसके बाद सखी वन स्टॉप सेंटर ने मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू की।

सखी वन स्टॉप सेंटर में पति को बुलाकर काउंसलिंग की गई और कानूनी अधिकारों से अवगत कराया गया। समझाइश के बाद पति विवाह में मिले सामान को लौटाने के लिए तैयार हुआ। इसके बाद केंद्र प्रशासक, पुलिस विभाग और संबंधित पक्षों की संयुक्त टीम महिला एवं उसके पति के निवास पर पहुंची और आपसी सहमति से पूरा सामान महिला को सुपुर्द कराया गया।

केंद्र में अब तक 86 प्रकरणों का हुआ निराकरण

महिला संरक्षण अधिकारी विभा बख्शी ने बताया कि सखी वन स्टॉप सेंटर संकटग्रस्त महिलाओं को विधिक, मानसिक और सामाजिक सहयोग उपलब्ध कराने के लिए लगातार सक्रिय है। उनके अनुसार, वर्ष 2025 से 2026 के बीच केंद्र में कुल 104 मामले दर्ज किए गए हैं, जिनमें से 86 मामलों का समाधान निकाला जा चुका है।

घरेलू हिंसा और पारिवारिक विवादों से पीड़ित महिलाओं को आवश्यकतानुसार परामर्श, सुरक्षा और अन्य विभागों से समन्वय स्थापित कर सहायता दी जा रही है, ताकि वे सम्मानपूर्वक जीवन जी सकें।

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